Pajhota Movement of Sirmaur (पझौता आन्दोलन हिमाचल) | HimExam.Net

0

पझौता आन्दोलन हिमाचल और सिरमौर के इतिहास में विशेष स्थान रखता है । अक्तूबर , 1942 . में सिरमौर रियासत के किसानों ने सरकार के अत्याचारी शासन और आर्थिक शोषण के विरुद्ध भारी जन - आन्दोलन करने की योजना बनाई । 




सिरमौर रियासत के ' गिरीवार ' इलाके के कुछ जागरूक किसान गांव जदोल - टपरोली में एकत्रित हुए । उन्होंने गांव के स्कूल के प्रांगण में बैठक की और इसी बैठक में एक "किसान सभा"  नामक संगठन की स्थापना की । कालान्तर में यह किसान सभा ‘ पझौता किसान सभा" के नाम से प्रसिद्ध हुई । 

वैद्य सूरत सिंह
वैद्य सूरत सिंह















इस सभा के सभापति कोटला - बागी गांव के लक्ष्मी सिंह चुने गये । 
कटोगड़ा के वैद्य सूरत सिंह को किसान सभा का सचिव बनाया गया । 
सभा के सभी सदस्यों ने " लोटे - नाण " किया ( अर्थात लोटे में नमकीन पानी बनाकर सबको चखाया और आपसी सहयोग एवं दायित्व की शपथ ली ) । 

पझौता किसान सभा ने अपनी प्रथम बैठक में ही सभा के उद्देश्य और कार्य निश्चित कर निम्नलिखित मांगे रियासती सरकार के सामने रखने का निर्णय किया गया :

1 . रियासत में प्रजा द्वारा निर्वाचित मन्त्रिमण्डल की स्थापना की जाए ।
2 . महिला रीत - टैक्स और बाल - विवाह प्रथा समाप्त की जाये ।
3 . आवश्यक फौजी भर्ती बन्द की जाए ।
4 . चराई - टैक्स , घराट - टैक्स , पशु - टैक्स समाप्त कर दिए जायें ।
5 . फसलों और आलुओं के खुले व्यापार का कानून बनाया जाए ।
6 . रियासत के भ्रष्ट और अत्याचारी कर्मचारियों को सरकार शीघ्र बदल दे ।
7 . ब्रिटिश सरकार की सहायता के लिए बनाए गए फसल कन्ट्रोल ऑर्डर को वापिस लिया । जाये ।
8 . विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार की मदद न की जाये ।
9 . नम्बरदार और जैलदार रियासती सरकार के दमनकारी और अत्याचारी शासन के विरोध में त्याग - पत्र दें ।
10 . गांवों में ग्राम सभा ' और ' ग्राम - पंचायत ' प्रथा का संचालन किया जाए ।
11 . जबरन वेगार बन्द की जाए ।
12 . बिना लाइसैंस के हथियार रखने की इजाजत दी जाए ।
13 . सरकारी कर्मचारियों पर जनता द्वारा किए गए खर्चे का भुगतान सरकार करे ।
14 . गिरी नदी पर पुल बनाया जाए ।
15 . रियासत में नये स्कूल , डाकघर , अस्पताल आदि खोले जायें ।


इन मांगों का एक चार्टर बनाकर महाराजा राजेन्द्र प्रकाश को भेज दिया गया ।  महाराजा राजेन्द्र प्रकाश ने पझौता के किसानों की मांगों पर विशेष ध्यान नहीं दिया । वे अकुशल और आराम - परस्त शासक थे और अपने मन्त्रियों और अधिकारियों के वश में थे । इसी कारण रियासत में नौकरशाही का मनमाना शासन चलता था । 

सबसे अधिक शक्तिशाली राजस्व मन्त्री राम गोपाल अभी था । इसलिए इस काल के शासन को लोग ' गोपाल - शाही के नाम से पुकारते थे । 

महाराजा ने दूसरे विश्व युद्ध में अंग्रेजों को सहायता प्रदान करने के लिए रियासत में जबरन भर्ती आरम्भ की । किसानों को खुले बाजार में फसलें और आलू बेचने की मनाही की और साथ में अनेक प्रकार के टैक्स लगाये । इस कारण मनमाने शासन और भ्रष्ट अधिकारियों के दमन और अत्याचार से दुखी जनता और भी अधिक कठिनाई का जीवन बिताने लगी ।



सिरमौर जिला के राजगढ़ तहसील का उतरी-पूर्व भाग पझौता घाटी के नाम से जाना जाता है । वैद्य सूरत सिंह के नेत्त्व में इस क्षेत्र के जांबाज एवं वीर सपूतों द्वारा सन 1943 में अपने अधिकार के लिए महाराजा सिरमौर के विरूद्ध आन्दोलन करके रियासती सरकार के दांत खटटे कर दिए थे । इसी दौरान महात्मा गांधी द्वारा सन 1942 में देश में भारत छोड़ों आन्दोलन आरंभ किया गया था जिस कारण इस आन्दोलन को देश के स्वतंत्र होने के उपरांत भारत छोड़ों आन्दोलन की एक कड़ी माना गया था । पझौता आन्दोलन से जुड़े लोगो को प्रदेश सरकार द्वारा स्वतंत्रता सैनानियों का दर्जा दिया गया ।

विभिन्न सूत्रों से एकत्रित की गई जानकारी के अनुसार महाराजा सिरमौर राजेन्द्र प्रकाश की दमनकारी एवं तानाशाही नीतियों के कारण लोगों में रियासती सरकार के प्रति काफी आक्रोश था । महाराजा सिरमौर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार की सेना और रसद प्रदान करके मदद कर रहे थे और जिस कारण रियासती सरकार द्वारा लोगों पर जबरन घराट, रीत-विवाह इत्यादि अनुचित कर लगाने के अतिरिक्त सेना में जबरन भर्ती होने के लिए फरमान जारी किए गए । रियासती सरकार के तानाशाही रवैयै से तंग आकर पझौता घाटी के लोग अक्तूबर 1942 में टपरोली नामक गांव में एकत्रित हुए और ” पझौता किसान सभा ”का गठन किया गया था जबकि आन्दोलन की पूरी कमान एवं नियंत्रण सभा के सचिव वैद्य सूरत सिंह के हाथ में थी । पझौता किसान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव को महाराजा सिरमौर को भेजा गया जिसमें बेगार प्रथा को बंद करने , जबरन सैनिक भर्ती ,अनावश्यक कर लगाने, दस मन से अधिक अनाज सरकारी गोदामो में जमा करना इत्यादि शामिल था । महाराजा सिरमौर राजेन्द्र प्रकाश द्वारा उनकी मांगों पर कोई गौर नहीं की गई । बताते हैं कि राजा के चाटूकारों द्वारा समझौता नहीं होने दिया जिस कारण पझौता के लोगों द्वारा बगावत कर दी गई और उस छोटी सी चिंगारी ने बाद में एक बड़े आंदोलन का रूप ले लिया।

पझौता आन्दोलन के तत्कालिक कारण आलू का रेट उचित न दिया जाना था । बताते है कि रियासती सरकार द्वारा सहकारी सभा में आलू का रेट तीन रूपये प्रति मन निर्धारित किया गया जबकि खुले बाजार में आलू का रेट 16 रूपये प्रतिमन था चूंकि आलू की फसल इस क्षेत्र के लोगों की आय का एक मात्र साधन थी। जिस कारण लोगों में रियासती सरकार के प्रति काफी आक्रोश पनम रहा था और वैद्य सूरत सिंह द्वारा अपनी टीम के साथ गांव गांव जाकर लोगों को इस आन्दोलन में अपना सहयोग देने बारे अपील की गई और इस आन्दोलन की चिंगारी पूरे पझौता क्षेत्र में फैल गई और लोग रियासती सरकार के विरूद्ध विद्रोह करने पर उतर गए ।
आन्दोलन के लिए गठित समिति का पहला कदम था राजा द्वारा यहां बनाए गए जेलदारों व नंबरदारों द्वारा अपने पद से त्याग पत्र देना। इसी दौरान जिला सिरमौर में न्यायाधीश के पद से डॉ. वाईएस परमार ने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया। जैसे ही राजा सिरमौर को इस बात की भनक लगी, उन्होंने नाहन से 50 सैनिकों के दल को इस आंदोलन को कुचलने व समिति के सदस्य को पकडने के लिए क्षेत्र में भेजा। इस दल का नेतृत्व डीएसपी जगत सिंह कर रहे थे। उन्होंने क्षेत्र का दौरा करके नाहन जाकर अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। बताते हैं कि इसी दौरान राजा पटियाला चूड़धार की यात्रा पझौता क्षेत्र के शाया में रूके थे।

उन्होंने इस आंदोलन का जायजा लिया और राजा सिरमौर को एक पत्र लिख कर इस आंदोलन का समाप्त करने के लिए उचित कदम उठाने का आग्रह किया गया । परिणामस्वरुप राजा ने इस आंदोलन को शांत करने व इनसें समझौता करने के लिए रेणुका के बूटी नाथ नारायण दत्त-दुर्गा दत्त आदि को पझौता क्षेत्र में भेजा। मगर समझौता कराने में यह असफल रहे। उनके बाद राजा ने आन्दोलन समिति के सदस्यों को समझौता करने के लिए नाहन बुलाया। मगर आंदोलनकारियों ने राजा के आग्रह को ठुकरा दिया।

अन्ततः महाराजा सिरमौर ने आंदोलन को कुचलने के लिए पुलिस दल को पझौता घाटी को भेजा। 6 मई 1943 को यह दल राजगढ़ पहुंचा। कुछ आंदोलनकारियों को राजगढ़ के किले में कैद कर लिया। 7 मई 1943 को कोटी गांव के पास आंदोलन कारियों व पुलिस के बीच मुठभेड़ हो गई। इसमें आंदोलनकारियों ने पुलिस दल को बंदी बना लिया। आंदोलनकारियों ने मांग रखी कि राजगढ़ किले में बंद आंदोलन कारियों को छोडा जाए। तभी वे पुलिस दल को छोड़ेंगे।

महाराजा सिरमौर ने स्थिति को अनियंतित्र देखते हुए 12 मई 1943 को पूरे क्षेत्र में मार्शल लॉ लगाने के आदेश जारी कर दिए और समूची पझौता घाटी को सेना के अधीन लाया गया जिसकी कमान मेजर हीरा सिंह बाम को सौपी गर्इ्र । सेना द्वारा आंदोलनकारियों को 24 घंटे में आत्मसमर्पण करने को कहा गया। मगर आंदोलनकारियों ने साफ मना कर दिया। उसके बाद सेना ने क्षेत्र में लूटपात आरंभ कर दी। इसी दौरान सेना द्वारा आन्दोलन के प्रणोता सूरत सिंह के

कटोगड़ा स्थित मकान को डॉईनामेट से उड़ा दिया गया जबकि एक अन्य आन्दोलनकारी कली राम के घर को आग लगा दी गई । इस सारे प्रकरण को देखते हुए आंदोलनकारियों ने अपने घर छोड़ दिए व ऊंची पहाडियों पर अपने कैंप बना लिए, ताकि वे सेना पर नजर रख सके। इसको देखते हुए सेना ने भी राजगढ़ के साथ ऊंची पहाड़ी सरोट नामक स्थान पर अपना कैंप बना लिया। 11 जून 1943 को निहत्थे लोगों का एक दल आंदोलनकारियों से मिलने जा रहा था। तो जिस समय कुफर घार के पास यह दल पहुंचा, तो सेना ने राजगढ़ के समीप सरोट के टीले से गोलियों की बौछार शुरू कर दी। रिकार्ड के अनुसार सेना द्वारा 1700 राउड़ गोलियां चलाई जिसमें कमना राम की मौके पर ही मौत हो गई। कुछ लोग घायल हो गए थे ।

दो मास के पश्चात सैनिक शासन और गोलीकांड के बाद सेना और पुलिस ने वैद्य सूरत सिंह सहित 69 आन्दोलनकारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया । नाहन में एक ट्रिब्यूनल गठित कर आन्दोलनकारियों पर 14 महीने तक देशद्रोह के मुकदमें चलाए गए और कमेटी के नौ सदस्यों की संपति को कुर्क कर दिया गया। । अदालत के निर्णय में 14 को बरी कर दिया गया । तीन को दो -दो साल ओर 52 आन्दोलनकारियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई ।

इस बीच कनिया राम, विशना राम, कलीराम, मोहीराम ने जेल में ही दम तोड़ दिया। उसके बाद सिरमौर न्याय सभा के नाम एक न्यायालय की स्थापना की गई। जिसमें इस मुकदमे को पुनः चलाया गया। जिसमे सजा को दस ओर पांच वर्ष में परिवर्तित किया गया । जिसमें वैद्य सूरत सिंह, मिंया गुलाब सिंह, अमर सिंह, मदन सिंह , कलीकरा आदि को दस वर्ष की सजा सुना दी गई । 15 अगस्त 1947 को देश के स्वतंत्र होने पर इस आन्दोलन से जुड़े काफी लोगों को रिहा कर दिया गया जबकि आन्दोलन के प्रमुख वैद्य सूरत सिंह, बस्तीराम पहाड़ी और चेत सिंह वर्मा को सबसे बाद में मार्च 1948 में रिहा किया गया ।

स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास लोगों को राष्ट्र भक्ति की प्रेरणा देता है और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर करने वााले महान सपूतों की कुर्बानियों एवं आदर्शों को अपने जीवन में अपनाना होगा ताकि देश की एकता एवं अखण्डता बनी रहे ।

Pazhota Movement holds a special place in the history of Himachal and Sirmaur. October, 1942. In the farmers of Sirmaur state, they planned to undertake mass mobilization against the tyrannical rule of government and economic exploitation.

Some conscious farmers of the 'Girivar' area of ​​Sirmaur State were gathered in Jodol-Taparoli. He held a meeting at the school premises of the village and in the same meeting established a "Kisan Sabha" organization. In the earliest times this Kisan Sabha has become famous as the Pazhota Kisan Sabha.



Lakshmi Singh of the Kotla-Baggi village was elected the Speaker of this meeting.

Vaidya Surat Singh of Katogada was made secretary of Kisan Sabha.

All the members of the House did the "Lotte-nan" (i.e., making salted water in the lotte and tasted it all and took an oath of mutual cooperation and liability).

Pazhota Kisan Sabha, in its first meeting, decided to fix the objectives and functions of the meeting and keep the following demands in front of the state government:

1. The establishment of the elected people in the state will be established.

2 . Female rituals - tax and child marriage - should be eliminated.

3. Required military recruitment should be closed.

4. Pasture - Tax, Domesticis - Taxes, Animals - Taxes should be terminated.

5. The law of open trade of crops and grains should be made.

6. The government will soon change the corrupt and tyrannical employees of the state.

7. Reverted crop control order made to support the British Government. Go.

8. The British Government should not be helped in World War.

9. Let the resignation in protest against the oppressive and tyrannical rule of Nambardar and Geldar Riyati government.

10. Gram Sabha and Village Panchayat system in villages should be run.

11. Forcibly withdraw the wager.

12. Allow to have arms without license

13. Government should pay the expenses incurred by the public on government employees.

14. A bridge will be built on the river Giri.

15. In the principals, new schools, post offices, hospitals, etc. should be opened.



By making a charter of these demands, Maharaja Rajendra Prakash was sent. Maharaja Rajendra Prakash did not pay special attention to the demands of the farmers of Pazhota He was unskilled and restful ruler and was in control of his masters and officials. For this reason, the arbitrary rule of bureaucracy was ruled in the state.


The most powerful revenue minister was Ram Gopal right now. Therefore, the people of this period were called by the name of Gopal-Shahi.


Maharaja started forced recruitment in the principality to provide assistance to the British in World War II. Farmers were allowed to sell crops and potatoes in the open market and put together a variety of taxes. Because of this, the oppressed and oppressed officials of the corrupt officials and oppressed people started living the life of even more difficulty.

The northeast of Rajgarh tehsil of Sirmaur district is known as Pazhota Valley. In the leadership of Vaidya Surat Singh, in 1943, by the brave and heroic sages of this region, they had made a dent in the government of Maharashtra by organizing a movement against Maharaja Sirmaur. In the meantime Mahatma Gandhi started the Quit India Movement in 1942 in which the movement was considered as a link to the movement to quit India after the country's independence. People connected with the Pazhota movement were given the status of freedom fighters by the state government.

According to the information gathered from various sources, due to the suppressive and dictatorship of Maharaja Srimmendra Rajendra Prakash, there was a lot of resentment towards the state government in the people. Maharaja Sirmaur was helping the British government by providing military and logistics during World War II, and due to which imprisonment of people, rituals etc., by the state government, in addition to improper taxation, rituals, etc. were issued for forced recruitment in the army. . The people of Pazhota Valley gathered in the village named Taparoli in October 1942 and the "Pazhota Kisan Sabha" was formed while fed up with the dictatorship of the Riyati government, while the entire command and control of the movement was in the hands of Vaidya Surat Singh. The proposal passed by the Pazhota Kisan Sabha was sent to Maharaja Sirmaur, which included forced closure of forced labor, recruitment for forced recruitment, unnecessary taxation, depositing more than ten grains in government godown etc. His demands were not noticed by Maharaja Srimor Rajendra Prakash. Explains that the agreement was not reached by the King's Chatukars, which was rebuffed by the people of Pazhota and that small spark later took the form of a big movement.

The potato rate was not given proper due to Pazhota movement. It states that the rate of potato was fixed at Rs 3 per liter in the co-operative assembly by the state government whereas the rate of potato in the open market was Rs. 16 per quintal as potato crop was the only source of income for the people of this region. The reason for which there was a lot of resentment towards the state government and Vaidya Surat Singh with his team went to village village and appealed to people to give their support for this movement and the spark of this movement spread throughout the area and people Riyasati landed on rebellion against the government.

The first step of the committee constituted for the movement was to give resignation letter to the post by the jails and the number of people formed by the King here. Meanwhile, Dr. YS Parmar gave his resignation letter from the post of Judge in District Sirmaur. As is Raja Sirmaur realized this, he sent a group of 50 soldiers from Nahan to crush the movement and catch the member of the committee. This team was led by DSP Jagat Singh. He visited the area and resigned from his post after visiting Nahan. Explains that during this time, the visit of King Patiala Chongdar stayed in the Shia of the Pazhota area.

He took stock of this movement and wrote a letter to King Sirmaur, urging him to take appropriate steps to end this movement. Consequently, Raja sent Nunar Narayan Dutt-Durga Dutt etc. of Renuka to Pazhota area to calm this agitation and settle them. But they failed to compromise. After them, Raja called the members of the movement's council to compromise. But the agitators rejected the king's insistence.

Eventually, Maharaja Sirmaur sent the police team to Pazhota Valley to crush the movement. On 6th May, 1943, the team reached Rajgadh. Some agitators were imprisoned in the fort of Rajgarh. On 7th May, 1943, a clash took place between the movement activists and the police near the village. In this, the agitators took the police team captive. The agitators demanded that the closed movement activities should be left at Rajgarh fort. Only then will they leave the police force.

Seeing the situation, Maharaja Sirmaur issued order on March 12, 1943 to impose martial law in the entire area and the entire Pazhota valley was brought under the army whose command was handed over to Major Hirah Singh Balam. The agitators were asked to surrender within 24 hours by the army. But the agitators refused to accept it. After that the army started looting in the area. 

The house located in Katugada was blown up by the nightmate while the house of another agitator Kali Ram was set on fire. In view of all this episode, the agitators left their homes and made their camps on high hills so that they could keep an eye on the army. In view of this, the army also made a camp with the Rajgarh to a high hill place named Sarot. On June 11, 1943, a group of unarmed people was going to meet the agitators. So when this team reached near Kufar Ghar, the army started firing bullets with Saraut's mound near Rajgarh. According to the record, the army launched 1700 round bullets in which Kamana died on the spot of Ram. Some people were injured.

After two months of military rule and after the gunfire, army and police arrested 69 activists including Vaidya Surat Singh and arrested in jail. A tribunal was set up in Nahan and the agitators were prosecuted for 14 months in the trial of treason and the property of nine members of the committee was surrendered. . 14 were acquitted in the court's judgment Three were sentenced to life imprisonment two to two years and 52 agitators.

Meanwhile, Kania Ram, Vishna Ram, Kali Ram and Mohiram died in jail. After that, a court was established in the name of the Sirmore judicial assembly. In which the case was resumed. In which sentence was changed ten to five years. In which Vaidya Surat Singh, Mianya Gulab Singh, Amar Singh, Madan Singh, Kalikira etc. were sentenced to ten years' sentence. On 15th August 1947, when the country was independent, many people associated with this movement were released, while the movement's chief Vaidya Surat Singh, Bastiam Hilli and Chet Singh Verma were first released in March 1948.

The history of freedom struggle inspires nation's devotion and protecting the motherland, the sacrifices and ideals of great sages who have to take their lives in life will have to be adopted so that the unity and integrity of the country is maintained.

SOURCE LINKS:
1. Alokik Himachal Pradesh

Man Behind this Post
Pankaj Dhatwalia

I writes for HimExam.net and co-owner of this website. You can follow me onTwitter, Facebook or Google+


Post a Comment

 
Top